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सरकार ने बेरोजगारी डाटा को नकारा- ‘अपनी संस्थाओं पर भरोसा, विदेशी पर नहीं’

देश में रोजगार की स्थिति गंभीर होने और बेरोजगारों में 83% युवा के होने की अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट को सरकार ने खारिज कर दिया है। इसने कहा है कि भारत की एजेंसियों के आँकड़े ऐसी तस्वीर नहीं पेश करते हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के हवाले से सवाल पूछने वाले लोगों को केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने गुलाम मानसिकता वाला क़रार दिया है। उन्होंने कहा है कि भारतीय एजेंसियों के आँकड़ों को मानना चाहिए।

अनुराग ठाकुर ने कहा, ‘हमारे पास अभी भी गुलाम मानसिकता है क्योंकि हम हमेशा विदेशी रेटिंग पर निर्भर रहे हैं। हमें इससे बाहर आने और अपने देश के संगठनों पर भरोसा करने की जरूरत है।’

युवा मामलों के मंत्री अनुराग ठाकुर ने एनडीटीवी युवा कॉन्क्लेव में कहा, ’64 मिलियन लोगों ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ पर पंजीकरण कराया है। यह ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कई अन्य देशों की जनसंख्या से भी बड़ी संख्या है।’ उन्होंने कहा, ‘जो 34 करोड़ मुद्रा ऋण दिए गए, वे नौकरी के अवसर भी पैदा कर रहे हैं। अब वे नौकरी मांगने वाले से नौकरी देने वाले बन गए हैं।’

 

आईएलओ रिपोर्ट के बारे में उन्होंने कहा कि भारत वर्षों से अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों पर निर्भर रहा है, लेकिन अब उसे घरेलू एजेंसियों के आंकड़ों पर ध्यान देना चाहिए जो अब समान रूप से काम कर रहे हैं।

 

बता दें कि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ की रिपोर्ट ने एक बार फिर भारत के शिक्षित युवाओं के बीच उच्च बेरोजगारी के मुद्दे को उजागर किया है।

 

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट में बताया गया है कि 2022 में कुल बेरोजगार आबादी में बेरोजगार युवाओं की हिस्सेदारी 82.9% थी।

मानव विकास संस्थान और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा तैयार भारत रोजगार रिपोर्ट 2024 में कहा गया है, ‘भारत में बेरोजगारी मुख्य रूप से युवाओं, विशेष रूप से माध्यमिक स्तर या उससे अधिक शिक्षा वाले युवाओं के बीच एक समस्या थी, और यह समय के साथ बढ़ती गई।’

 

रिपोर्ट के अनुसार भारत के बेरोजगार कार्यबल में लगभग 83% युवा हैं और कुल बेरोजगार युवाओं में माध्यमिक या उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की हिस्सेदारी 65.7% है। यानी बेरोजगार युवाओं के बारे में कोई यह भी नहीं कह सकता है कि जब पढ़ाई नहीं पढ़ेंगे तो रोजगार कहाँ से मिलेगा। ऐसे पढ़े-लिखे युवाओं का प्रतिशत बढ़ता रहा है। साल 2000 में यह दर 35.2 फ़ीसदी ही थी। यानी क़रीब 22 साल में इसमें क़रीब 30% प्वाइंट की बढ़ोतरी हुई है। यह भारत रोजगार रिपोर्ट 2024 में आँकड़ा आया है।

 

रिपोर्ट के अनुसार 2022 में युवाओं के बीच बेरोजगारी दर पढ़े-लिखे युवाओं में कहीं ज़्यादा थी। युवाओं में उन लोगों की तुलना में छह गुना अधिक थी, जिन्होंने माध्यमिक शिक्षा या उच्च शिक्षा पूरी कर ली थी (18.4%) और स्नातकों के लिए नौ गुना अधिक (29.1%) थी, जो पढ़ या लिख नहीं सकते थे उनकी 3.4% ही थी।

 

रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि भारत शिक्षा के स्तर में मजबूत सुधार के साथ अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का फायदा ले सकता है।

 

आईएलओ की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगर भारत 5 नीतिगत क्षेत्रों पर काम करता है तो अगले दशक में श्रम कार्यबल में 70-80 लाख युवाओं को जोड़ देगा। रिपोर्ट में रोजगार सृजन, रोजगार की गुणवत्ता, श्रम बाज़ार में असमानताएँ, सक्रिय श्रम बाजार के कौशल और नीतियों दोनों को मजबूत करना और श्रम बाजार पैटर्न और युवा रोजगार पर जानकारी की कमी को पाटने की ज़रूरत बताई गई है।

 

अनुराग ठाकुर ने कहा है कि 2014 में पदभार संभालने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्यमियों की सहायता के लिए नीतियां भी बनाई हैं, जो एक और तरीका है जिससे सरकार रोजगार पैदा कर रही है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा, ‘अब लोग स्टार्ट-अप शुरू करने में संकोच नहीं करते हैं। मैं ऐसे कई लोगों से मिला हूँ जिन्होंने प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की और भारत के बाहर नौकरी की, अब वापस आ गए हैं और भारत में स्टार्ट-अप चला रहे हैं।’

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