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क्या महत्व है अधिक मास का श्री महंत डॉ रविंद्रपुरी

पुरुषोत्तम मास
दत्त परंपरा में विशेष महत्व
“गुरु कृपा, वैराग्य और आत्मबोध का विशेष काल”

पुरुषोत्तम मास क्या है?
पुरुषोत्तम मास को अधिक मास भी कहा जाता है।
हिंदू पंचांग चंद्रमा और सूर्य की गति पर आधारित है। चंद्र वर्ष और सौर वर्ष में लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग 32 महीने 16 दिन के बाद एक अतिरिक्त चंद्र मास जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहते हैं।

जब यह अतिरिक्त मास आता है, तब उसे भगवान विष्णु ने अपना स्वरूप प्रदान कर “पुरुषोत्तम मास” नाम दिया। इसलिए यह महीना अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना जाता है।

पुरुषोत्तम मास की कथा
पुराणों में वर्णन आता है कि यह अतिरिक्त मास अन्य महीनों की तुलना में उपेक्षित माना जाता था। तब इस मास ने भगवान विष्णु से शरण मांगी।
भगवान ने इसे अपना नाम देकर कहा:
“अब तुम मेरे स्वरूप पुरुषोत्तम के नाम से पूजित होगे।”
तभी से यह मास “पुरुषोत्तम मास” कहलाया।

॥ ॐ श्री दत्तात्रेयाय नमः दिगंबरं परमं शांतम् ॥

जब समय स्वयं साधना का निमंत्रण बन जाए,
जब दिन केवल संसार के लिए नहीं बल्कि आत्मा के जागरण के लिए बहने लगें,
जब भीतर कोई मौन पुकारे —
“अब लौटो अपने वास्तविक स्वरूप की ओर” —
तब समझना चाहिए कि पुरुषोत्तम मास का आगमन हुआ है।
हिंदू धर्म में पुरुषोत्तम मास केवल एक अतिरिक्त महीना नहीं है।

यह आत्मा को परमात्मा के निकट ले जाने वाला एक दिव्य अवसर है।

और दत्त परंपरा में तो यह मास विशेष रूप से “गुरु तत्व” की कृपा प्राप्त करने का काल माना गया है।
गुरुदेव दत्तात्रेय केवल देवता नहीं, बल्कि संपूर्ण गुरु परंपरा के आदिस्रोत हैं।

उनमें ब्रह्मा का ज्ञान, विष्णु की करुणा और महेश का वैराग्य एक साथ प्रकट होता है।
इसलिए पुरुषोत्तम मास में दत्त साधना साधक के भीतर तीन महान परिवर्तन उत्पन्न करती है:

गुरु कृपा का जागरण
वैराग्य का उदय

आत्मबोध की दिशा
१. गुरु कृपा का विशेष काल
दत्त परंपरा मानती है कि साधना केवल प्रयास से पूर्ण नहीं होती;
उसमें गुरु कृपा का अवतरण आवश्यक है।
पुरुषोत्तम मास में साधक जब श्रद्धा से जप, ध्यान और नामस्मरण करता है, तब गुरु तत्व अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होता है।
यह समय बाहरी उपलब्धियों से अधिक आंतरिक शुद्धि का होता है।

कहा जाता है:
“जिसे वर्षों की तपस्या में अनुभव न हो, वह पुरुषोत्तम मास की सच्ची भक्ति में अनुभव हो सकता है।”

दत्त साधना में इस मास के दौरान:
गुरुचरित्र पाठ
दत्त नाम जप
मौन साधना
ब्रह्ममुहूर्त ध्यान
गुरु चरण स्मरण
विशेष फलदायी माने गए हैं।

२. वैराग्य का जागरण
गुरुदेव दत्तात्रेय अवधूत हैं।
उन्होंने संसार का त्याग नहीं, बल्कि संसार के मोह का त्याग सिखाया।
पुरुषोत्तम मास साधक को यह अनुभव कराता है कि:
शरीर क्षणभंगुर है,
इच्छाएँ अनंत हैं,
लेकिन आत्मा शाश्वत है।
जब साधक इस मास में सात्त्विक जीवन अपनाता है, इंद्रिय संयम रखता है और नामजप करता है, तब भीतर धीरे-धीरे वैराग्य प्रकट होने लगता है।
यह वैराग्य भागना नहीं है।
यह संसार के बीच रहते हुए भी भीतर से स्वतंत्र होना है।
दत्त परंपरा कहती है:
“वैराग्य वह दीप है, जिसमें आत्मज्ञान का प्रकाश स्थिर होता है।”

३. आत्मबोध की दिशा
पुरुषोत्तम मास का अंतिम उद्देश्य केवल पुण्य कमाना नहीं, बल्कि आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप का स्मरण कराना है।

गुरुदेव दत्तात्रेय जी की साधना साधक को बाहर से भीतर की ओर ले जाती है।
जहाँ:
मन शांत होता है,
वासनाएँ क्षीण होती हैं,
और भीतर का साक्षी जागृत होने लगता है।
दत्त मार्ग में आत्मबोध का अर्थ है:
“अपने भीतर स्थित गुरु तत्व को पहचानना।”
जब साधक नियमित रूप से:

॥ ॐ श्री दत्तात्रेयाय नमः ॥
का जप करता है, तब धीरे-धीरे उसका चित्त स्थिर होने लगता है।
मन की अशांति कम होती है और भीतर एक अदृश्य शांति उतरने लगती है।

पुरुषोत्तम मास में दत्त साधना कैसे करें?
प्रतिदिन
प्रातः स्नान के बाद दीप प्रज्वलित करें।
गुरुदेव दत्तात्रेय का ध्यान करें।
कम से कम 108 बार जप करें:
॥ ॐ श्री दत्तात्रेयाय नमः दिगंबरं परमं शांतम् ॥

विशेष साधनाएँ
गुरुचरित्र पाठ
विष्णु सहस्रनाम
गीता अध्ययन
गौसेवा
अन्नदान
मौन और आत्मचिंतन
दत्त परंपरा का गूढ़ संदेश
दत्त मार्ग यह नहीं कहता कि संसार छोड़ दो।
वह कहता है:
“अहंकार छोड़ दो।”

पुरुषोत्तम मास साधक को यही अवसर देता है —
अपने भीतर के शोर को शांत करने का,
गुरु कृपा को अनुभव करने का,
और आत्मा की ओर लौटने का।
समापन

पुरुषोत्तम मास वास्तव में समय का वह द्वार है जहाँ साधारण जीवन भी साधना बन सकता है।
दत्त परंपरा में यह केवल धार्मिक अनुष्ठान का महीना नहीं, बल्कि आत्मजागरण का पर्व है।
यदि श्रद्धा, विनय और समर्पण के साथ इस मास में गुरुदेव दत्तात्रेय का स्मरण किया जाए, तो साधक के भीतर ऐसी शांति और स्पष्टता प्रकट हो सकती है जो शब्दों से परे है।

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