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शिव जी ने अपने पुत्र को नियुक्त किया था देवताओं का सेनापति, कार्तिकेय ने किया था तारकासुर का वध :स्वामी राम भजन वन

कार्तिकेय स्वामी का जन्म शिव जी और पार्वती जी से दूर सरकंडे के एक वन में हुआ था।

बालक के छह मुख थे। उस वन में कृतिकाएं रहती थीं। कृतिकाओं को वह बालक मिला और उन्होंने इसका पालन किया था। इसी वजह से बालक का नाम कार्तिकेय पड़ा।

शिव जी और पार्वती जी से दूर बच्चा बड़ा होने लगा। कृतिकाएं बहुत अच्छी तरह से बालक का ध्यान रखती थीं। एक दिन शिव जी को अपनी संतान के बारे में मालूम हुआ।

संतान के बारे में जानकारी मिलते ही शिव जी अपने सेवकों को तुरंत ही सरकंडे के वन में भेजा और बालक को लेकर आने के लिए कहा।

शिव जी के दूत वीरभद्र, विशालाक्ष, शंभुकर्ण, नंदीश्वर, गौकर्णास्य, दधिमुख आदि सरकंडे के वन में पहुंचे और कृतिकाओं के साथ कार्तिकेय स्वामी को लेकर शिव जी के पास लौट आए।

कार्तिकेय कैलाश पर्वत पर पहुंचे तो सभी बहुत खुश थे। शिव जी और पार्वती जी ने बालक को गले लगाया और उसे बताया कि तुम हमारी संतान हो। शिव-पार्वती ने कार्तिकेय को परिवार का महत्व समझाया और परिवार के साथ ही समाज की भलाई के लिए काम करने की सीख दी। शिव जी ने कार्तिकेय से कहा कि तुम बहुत वीर हो और इसलिए आज से तुम्हें देवताओं का सेनापति नियुक्त किया जा रहा है।

उस समय तारकासुर का आतंक था और उसे वरदान मिला था कि उसका वध शिव पुत्र द्वारा ही होगा। जब कार्तिकेय स्वामी देवताओं के सेनापति बने तो उन्होंने तारकासुर का वध किया था।

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