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उजाला कम ना हो:हम इच्छाशक्ति का आदर करें, फिर देखिए इसका चमत्कार! स्वामी राम भजन वन

इच्छाशक्ति! छोटा-सा शब्द है, लेकिन इसका प्रभाव हर असम्भव को सम्भव बना सकता है। आज हम दुनिया में जो कुछ भी अच्छा, सच्चा और सार्थक देखते हैं, वह सब अटल इच्छाशक्ति का ही परिणाम है। अगर मनुष्य में इच्छाशक्ति न होती तो हमारे पास न बिजली का बल्ब होता और न ही स्मार्टफोन, न ही हम दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बना पाते और न ही चंद्रमा पर जा पाते। चांद की मिट्टी ले आने से लेकर मंगल तक उड़ान भरने तक के हज़ारों-लाखों उदाहरण हैं मनुष्य की इच्छाशक्ति के, लेकिन भाव सबका एक है, ‘जो आप सोच सकते हैं, वो आप कर भी सकते हैं।’

सफलता का इससे बड़ा राज और क्या हो सकता है। जिस दिन से हम इच्छाशक्ति जैसे रामबाण को अपने तरकश में जगह देने लगेंगे, दुनिया का कोई भी लक्ष्य हमारे लिए अभेद्य नहीं रहेगा। क्या दुनिया ने कभी विचार किया था कि हज़ार साल से ज़्यादा पराधीन रहने वाला भारतवर्ष अर्थव्यवस्था में ब्रिटेन जैसे विकसित देश से आगे निकल जाएगा? कभी नहीं! लेकिन हम भारतवासियों ने ज़रूर विचार किया था, और इसीलिए आज हमने वो कर दिखाया जिसे दुनिया कोरी कल्पना मानती थी। इतिहास के पन्नों से पूछने पर पता चलता है कि भारतवर्ष ही वो ‘सोने की चिड़िया’ थी जिसके पंखों को काटकर बदनियत फ़िरंगी इंग्लैंड ले गए और इन्हीं कटे हुए पंखों पर सवार होकर इंग्लैंड की इकोनॉमी एक समय आसमान छूने लगी। उपनिवेश काल से पहले पूरी दुनिया की जीडीपी में हमारी हिस्सेदारी लगभग 24 फीसदी थी, लेकिन 1947 में जब हम आज़ाद हुए तब तक जीडीपी के ये आंकड़े खिसककर 3 फीसदी पर आ चुके थे।

दशरथ मांझी के पैरों के छाले से नीरज के भाले तक कितने ही ऐसे उदाहरण हमारे सामने हैं, जिन्होंने इच्छाशक्ति की उजली स्याही से सफलता की पांडुलिपि पर अपने पौरुष की मुहर लगाई है, लेकिन हमारी समस्या यह है कि हम आज एकांगी हो गए हैं। न ही सही नायक चुन पाते हैं और न ही उनका अनुसरण कर पाते हैं। हम सदैव इसी ऊहापोह में रहते हैं कि हमारा नायक कौन हो सकता है? किसे हम अपना आदर्श मानें? किसकी दिखाई हुई राह पर हम बिना शंका के चलें, जिससे हमारी संघर्ष से सफलता तक की यात्रा सटीक और आसान हो जाए। दुर्भाग्यवश इसी ऊहापोह में हमारे जीवन का सबसे ‘प्रोडक्टिव फ़ेज़’ यानी युवावस्था हमारे हाथ से सूखी रेत की तरह फ़िसल जाती है। हाल ही में हमारे देश के एक बड़े उद्योगपति गौतम अडानी ने अपनी इच्छाशक्ति के परचम से पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया। समृद्धि के ट्रैक पर चलती हुई उनकी रेल ‘बुलेट ट्रेन’ बन गयी और बहुत ही कम समय में उन्होंने बड़े-बड़े दिग्गजों को पीछे छोड़ दुनिया के दूसरे सबसे धनी व्यक्ति का ख़िताब हासिल किया। ये हम सबके लिए गर्व की बात होनी चाहिए। किसी भारतीय ने आगे बढ़कर पूरी दुनिया को ‘नए भारत का नया संदेश’ दिया है, लेकिन हमें इसमें भी बुराई ही नज़र आती है। जिस व्यक्ति से हमें सीखना चाहिए, जिसकी सफलताओं को मील का पत्थर बनाकर हमें आगे यात्रा करनी चाहिए, उसे हम क्या देते हैं? सिर्फ़ और सिर्फ़ आलोचनाएं! मैं जानना चाहता हूं कि हम निर्धनता और विपन्नता में सुख ढूंढना कब बंद करेंगे? कब हम पैसे को, संपन्नता को आदर की दृष्टि से देखना शुरू करेंगे? हम उस संस्कृति में जन्मे हैं जहां धर्म, काम और मोक्ष के साथ अर्थ को भी जीवन के पुरुषार्थों में गिना जाता है। लक्ष्मी की पूजा करने वाली सभ्यता हैं हम, फिर कब हमें ये दर्शन दे दिया गया कि पैसा ख़राब चीज़ है, पैसेवाले बुरे लोग होते हैं। पैसा अपने आप में कभी बुरा नहीं हो सकता, यदि वो बुरे रास्ते से न कमाया गया हो। पैसे के लिए हमारी उदासीनता हमारे विकास में बहुत बड़ी बाधा है, ये सोच हमें बदलनी होगी, तभी दुनिया के बाज़ार में अडानी की तरह कई और भारतवासी ऊंचे स्थान पर चमकते हुए मिलेंगे। यहां ये स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मैं अडानी का नहीं बल्कि उस इच्छाशक्ति का समर्थन कर रहा हूं, उस पुरुषार्थ का समर्थन कर रहा हूं, जिसकी उजली चमक ने उन्हें सफलता का सूर्य बना दिया।

हम अपनी इच्छाशक्ति पर विश्वास करना सीखें। गोस्वामी श्री तुलसीदास ने भी कहा है, ‘जेहि का जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥’

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