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वर्तमान में किए जा रहे काम पर ही पूरा ध्यान; श्री महंत रवींद्र पुरी

जीवन जीने के दो ढंग है। संसार से लिप्तता या निर्लिप्तता। संसार से इसी लिप्तता को शंकर ‘माया’ कहते है तो बुद्ध ‘दु:ख’। चेतना के शिखर को छूने वाले सभी बुद्धपुरुषों, अवतारों ने संसार से निर्लिप्तता के लिए जो जीवनदृष्टि बतलाई है वह है संसार को जागकर देखना। पूरे विश्व में आज किसी विचार या शब्द को लेकर पूर्ण सहमति है तो वह है- माइंडफुलनेस। आध्यात्मिक जगत में इसे व इससे जुड़े अभ्यासों को ‘जागरूकता ध्यान’, ‘होश की साधना’, ‘साक्षी की साधना’, ‘वर्तमान में रहना’ के नाम से जाना जाता है। यही अभ्यास वैज्ञानिक रूप से जांच व परीक्षण के बाद माइंडफुलनेस के नाम से दुनियाभर में प्रचलित हो चुका है। इसका अभ्यास कभी भी, कहीं भी किया जा सकता है- चलते हुए, बैठे हुए, खाना खाते हुए, चाय पीते हुए, बातचीत करते हुए, नहाते हुए भी।

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