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महाभारत में है पितृ पक्ष का जिक्र:भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को बताया था श्राद्ध के बारे में ;श्री महंत रवींद्र पुरी

महर्षि निमि से जुड़ी है श्राद्ध पक्ष की परंपरा

महाभारत में अनुशासन पर्व के अध्याय 91 में महर्षि निमि की कथा है। ब्रह्मा जी से अत्रि मुनि की उत्पत्ति हुई। अत्रि मुनि के यहां दत्तात्रेय भगवान का जन्म हुआ। दत्तात्रेय के यहां निमि ऋषि का जन्म हुआ।

निमि ऋषि का एक पुत्र था श्रीमान। श्रीमान की मृत्यु कम उम्र में ही हो गई थी। निमि ऋषि अपने पुत्र के वियोग में दुखी थे। एक बार निमि ऋषि ने अमावस्या तिथि पर पुत्र के लिए श्राद्ध कर्म किया था। उन्होंने ब्राह्मणों को भोजन कराया। पिंडदान किया था। इनके बाद से ही श्राद्ध करने की परंपरा शुरू हुई।

महाभारत में ब्रह्मा, पुलस्त्य, वसिष्ठ, पुलह, अंगिरा, क्रतु और महिर्ष कश्‍यप ये सात मुख्य पितर देवता बताए गए हैं।

श्राद्ध कर्म करने से हमें मृत व्यक्ति के जाने का दुख सहन करने की शक्ति मिलती है। दुख कम होता है। मन ये भाव रहता है कि हमने हमारे प्रिय व्यक्ति के लिए कुछ अच्छा काम किया है।

पितरों का भोजन अग्नि में क्यों चढ़ाया जाता है?

पितरों के लिए धूप-ध्यान करते समय भोजन जलते हुए अंगारों पर ही चढ़ाया जाता है। इस संबंध में महाभारत में बताया गया है कि जब श्राद्ध कर्म होने लगे तो पितर देवताओं को भोजन न पचने की समस्या हो गई। भोजन न पचने से पितर देवताओं को दिक्कतें हो रही थीं। तब वे सभी ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने पितरों की बात सुनी और उन्हें अग्नि देव के पास भेज दिया।

अग्निदेव ने पितरों से कहा कि अब से मैं भी आपके साथ श्राद्ध का भोजन करूंगा। मेरे साथ आप भोजन करेंगे तो आपकी सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी। तभी भी धूप-ध्यान के समय अंगारों में भोजन चढ़ाया जाता है।

अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु तिथि न मालूम हो तो क्या करें?

अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु तिथि मालूम न हो तो सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या (25 सितंबर) पर सभी जाने-अनजाने पितरों के नाम से धूप-ध्यान, पिंडदान आदि शुभ कर्म किए जा सकते हैं। पितरों के लिए एक बर्तन में कच्चा दूध, कुश, जल, फूल लें। दाएं हाथ के अंगूठे की ओर से पितरों का ध्यान करते हुए जल चढ़ाएं।

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