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खगकुल:वर्षा में सुनाई देती हैं चातक और पपीहे की आवाज़, गोस्वामी तुलसीदास को था चातक बड़ा प्रिय:स्वामी राम भजन वन

  • पपीहे और चातक बारिश आगमन की सूचना देते हैं। इनकी आवाज़ में किसी को पी कहां सुनाई देता है, तो किसी को प्यासो हों।
  • लोक मान्यता है कि ये सिर्फ़ स्वाति नक्षत्र में बरसी बूंदें ही पीते हैं। बरसात, प्यास और पिया मिलन की आस से जुड़े इन सुमधुर पंछियों ने सदियों से अद्‌भुत काव्य की रचना को प्रेरित किया है।

    ऊंचे पेड़ की ऊंची फुनगी पर बैठा बोल रहा है पपीहा। पी कहां, पी कहां! पपीहे की मादा घने पेड़ के पत्तों में छिपी बैठी है। नर उसे ही टेर रहा है। मीठे-मीठे गीत गाकर बुला रहा है।

    सदियों से विरहनी युवतियों, महिलाओं, पुरुषों, कवियों, साहित्यकारों को पपीहे का स्वर आकर्षित करता रहा है। दिल में आग लगाता रहा है। कालिदास से लेकर आज तक कवि और फिल्मकार अपने-अपने अंदाज़ से पपीहे की बोली को व्याख्यायित करते रहे हैं, गीत-कविताएं और कहानियां लिखते रहे हैं। हरिवंश राय बच्चन लिखते हैं-

    यह पपीहे की रटन है। बादलों की घिर घटाएं। भूमि की लेती बलाएं। खोल दिल देती दुआएं।। दीप किस उर में जलन है। यह पपीहे की रटन है।। यह न पानी से बुझेगी। यह न पत्थर से दबेगी। यह न शोलों से डरेगी।। यह वियोगी की लगन है। यह पपीहे की रटन है।।

    बहुत से लोग कहते हैं कि पपीहा प्यास के मारे पानी मांगता है, कहता है- प्यासो हों, प्यासो हों, किंतु बच्चन जी इसे विरह की पीड़ा कहते हैं।

    महादेवी वर्मा गाती हैं-

    रे पपीहे पी कहां?

    खोजता तू इस क्षितिज से उस क्षितिज तक शून्य अम्बर लघु भरी से नाप गागर प्रिय बसा उर में सुभग सुधि खोज की बसती कहां? रे पपीहे पी कहां?

    हिंदी फिल्मों में पपीहे, चातक को लेकर कई गीत हैं। सन् 1966 में एक फिल्म आई थी आए दिन बहार के। इसमें आनंद बख्शी का लिखा हुआ और लता मंगेशकर का गाया एक गीत था- सुनो सजना पपीहे ने… जो बहुत लोकप्रिय हुआ था।

    पपीहा और चातक हिंदी कवियों के प्रिय पक्षी हैं। तुलसीदास ने तो चातक चौतीसी लिखी है जिसमें 34 दोहे हैं। एक दोहा द्रष्टव्य है-

    एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास। एक राम घनश्याम हित चातक तुलसी दास।।

    तुलसीदास अपना प्रेम, चातक जैसा राम के प्रति करना चाहते हैं। सिर्फ राम को ही अपना आराध्य मानकर चातक की तरह राम में ही अपना दिल लगाए रहना चाहते हैं और यही कामना तुलसीदास करते हैं और इसी कारण तुलसी को चातक / पपीहा पक्षी अति प्रिय है।

    कवि पपीहा को विरह गीत गायक पक्षी कहते हैं। कहते हैं यह सिर्फ बरसात में स्वाति नक्षत्र का ही पानी पीता है, नहीं तो सालभर प्यासा रह जाता है। लोक मान्यता है कि शिकारी यदि पपीहे को पकड़कर उसकी चोंच नदी, नाले, तालाब अथवा बाल्टी के पानी में डुबो भी दें तो भी वह पानी नहीं पीता चोंच नहीं खोलता। वैज्ञानिक इस बात को नहीं मानते और इसे सिर्फ़ गायक पक्षी मानते हैं।

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