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51 शक्तिपीठों में से एक है कामाख्या मंदिर:श्री महंत रवींद्र पुरी

ये है कामाख्या शक्ति पीठ की पौराणिक कथा

शिव जी का विवाह प्रजापति दक्ष की पुत्री देवी सती से हो गया था। दक्ष शिव जी को पसंद नहीं करता था और बार-बार शिव जी का अपमान करने की कोशिश करते रहता था।

दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ में उसने सभी देवी-देवताओं, ऋषियों को आमंत्रण दिया, लेकिन शिव जी और सती को नहीं बुलाया। जब ये बात देवी सती को मालूम हुई तो वे पिता के यहां जाने के लिए तैयार हो गईं।

शिव जी ने सती को समझाने की कोशिश की कि हमें बिना बुलाए ऐसे किसी कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए, लेकिन देवी ने कहा कि पिता के यहां जाने के लिए किसी निमंत्रण की जरूरत नहीं होती है।

शिव जी ने सती को रोकना चाहा, लेकिन सती जिद करके पिता के यहां यज्ञ में चली गईं। यज्ञ स्थल पर दक्ष प्रजापति ने सती के सामने ही शिव जी के लिए अपमानजनक बातें कह दीं।

पति के लिए अपमानजनक बातें सुनकर देवी सती क्रोधित हो गईं और वहीं यज्ञ कुंड में कूदकर अपनी देह का अंत कर दिया। शिव जी को पूरी घटना की जानकारी मिली तो वे दक्ष पर क्रोधित हो गए और वीरभद्र को प्रकट करके दक्ष का अंत करने का आदेश दे दिया।

शिव जी ने देवी सती के जलते हुए शरीर को उठाया और देवी के वियोग में सृष्टि में भटकने लगे। उस समय भगवान विष्णु ने सोचा कि जब तक देवी का शरीर शिव जी के पास रहेगा तब तक वे देवी के मोह से दूर नहीं हो पाएंगे। इसके बाद भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी के शरीर के टुकड़े करना शुरू कर दिए।

देवी के शरीर के ये टुकड़े जहां-जहां गिरे थे, वहां-वहां देवी के शक्तिपीठ स्थापित हो गए। कामाख्या मंदिर क्षेत्र में देवी मां को योनि भाग गिरा था। इस कारण यहां देवी के योनि भाग की पूजा की जाती है।

कामाख्या मंदिर में हर साल लगभग 22 जून से 26 जून तक अंबुबाची उत्सव मनाया जाता है। इस उत्सव के संबंध में मान्यता है कि इन दिनों में देवी मां का मासिक धर्म रहता है। इस कारण इन दिनों में मंदिर बंद कर दिया जाता है।

तंत्र-मंत्र की क्रियाओं के प्रसिद्ध है ये जगह

देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर में तंत्र-मंत्र की क्रियाएं काफी अधिक की जाती हैं। इन क्रियाओं की वजह से ये मंदिर विश्व प्रसिद्ध है। यहां देवी त्रिपुरासुंदरी, मतांगी और कमला के साथ ही अन्य देवियों की मूर्तियां स्थापित हैं। यहां एक योनिकुंड भी स्थित है, जिसकी परिक्रमा की जाती है। यहां हर साल आषाढ़ महीने में अम्बुबाची मेला लगता है।

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