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शास्त्रों में यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म कहा गया है, बहुत प्राचीन समय से हो रहे हैं हमारे देश में यज्ञ:स्वामी राम भजन वन

यज्ञ एक ऐसा बहुअर्थी शब्द है जो आर्यावर्त में आदिकाल से उपस्थित है। चतुर्वेद यज्ञ की प्राचीनता की साक्षी देते हैं। यह गद्य कृति यज्ञ की इसी प्राचीनता और अनेक अर्थों पर केंद्रित है।

संस्कृत के मूर्धन्य व्याकरणज्ञ महर्षि पाणिनि ने ‘यज्ञ’ शब्द की उत्पत्ति ‘यज्’ धातु से बताई है। ब्राह्मण ग्रंथों में ‘यजुष्’ को यज् धातु से सम्बद्ध कहा है। इस प्रकार ‘यजु:’ ‘यज्’ तथा ‘यज्ञ’ तीनों एक-दूसरे के पर्याय हो जाते हैं।

यज्ञ की विवेचना से पूर्व अव्वल तो यह कि जिस यज्ञ को लोकवासी ‘यग्य’ पढ़ते हैं, उसका यह उच्चारण अशुद्ध है। इस यज्ञ में जो ‘ज्ञ’ है उसका उच्चारण ‘ग्य’ न होकर ‘ज्‌ञ’ है। पांच (पाञ्च) में भी इसी ‘ञ’ की ध्वनि है।

यह य+ज्+ञ का सायुज्य है। इसका उच्चारण ‘यज्‌ञ’ होगा। बहरहाल, यज्ञ एक चिरपरिचित शब्द है। जननी तुल्य संस्कृत भाषा का यह यज्ञ हवन-पूजनयुक्त एक वैदिक अनुष्ठान है। वैदिक काल में अनेक प्रकार के यज्ञों का आयोजन किया जाता था और इसी यज्ञ संस्कृति की अविरल धारा बहकर आज विक्रम की 21 सदी तक आ पहुंची है।

यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म कहा गया है- यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म।

यज्ञ की इच्छा करने वाला यज्ञकाम कहाता है। यज्ञ करने वाला यजंत, यजत्र, यज्ञकर्ता, यज्ञकृत, यजि और याज है। यज्ञ करने, कराने का कार्य याजन है और कराने वाले याज्ञिक। जो व्यक्ति यज्ञकर्म में कुशल हो वह याज्ञिय है। जिस मनुष्य के आग्रह पर यज्ञ सम्पन्न होगा वे यजमान हैं। इसी से यजमान को यज्ञपति भी कह सकते हैं। यजमानों के वासस्थान को भी यजमानी कहते हैं और पुरोहित की पुरोहिती में भी यजमानी का भाव है। जिस स्थान को यज्ञ करने के उद्देश्य से घेरा हो वह यज्ञवाट है। यज्ञसंस्तर और यज्ञसदन, यज्ञभूमि के पर्याय हैं। यज्ञ करने हेतु कुश से बनाया गया मंडप यज्ञशरण है। कुश यज्ञभूषण है।

यज्ञ में देवताओं का आवाहन करने वाला यज्ञहोता है। शास्त्रनिर्दिष्ट यज्ञ के समय को भी यज्ञकाल कहते हैं और पूर्णमासी को भी। एक प्रकार के साम का नाम यज्ञायज्ञिय है। यह साम अग्निष्टोम यज्ञ में गाया जाता है। याज्ञतूर भी एक प्रकार का साम है।

यज्ञो भुवनस्य नाभि: यानी यज्ञ को भुवन की नाभि कहा गया है।

सोमपान भी यज्ञ का अंग हुआ करता था। इस सोम को यज्ञरस कहा गया और सोमलता यज्ञवल्ली व यज्ञांगा पुकारी गई। वट यज्ञवृक्ष है। यज्ञ संचालक ब्राह्मण देव होते हैं और इन देव को यजूदर भी कहते हैं। वहीं यजाक का अर्थ उदार व पूजक है। यज्ञ द्वारा संस्कार किया हुआ सूत्र, जनेऊ यज्ञोपवीत है, यज्ञसूत्र है। उपनयन संस्कार ही यज्ञोपवीत संस्कार है।

आवश्यक तो नहीं कि यज्ञ सभी को भाते हों, लिहाज़ा जिस मनुष्य को यज्ञ से द्वेष हो उसे यज्ञकोप विशेषण दिया गया। इसी से पुराणों में एक राक्षस का नाम यज्ञकोप है। यदि किन्हीं कारणों से यज्ञ भंग हो जाए, विफल हो जाए तो यज्ञविभ्रंश हो जाता है।

वैदिक संस्कृति यज्ञ संस्कृति थी। वेदों में अनेकानेक यज्ञों का उल्लेख द्रष्टवय है। इन वेदों की संख्या चार है और चर्तुवेद में से एक है यजुर्वेद। इस वेद में यजुओं (गद्य मंत्रों) का संग्रह है। जिन मंत्रों में चरण या अवसान विषयक कोई नियम न हो वे यजु कहाते हैं। ‘गद्यात्मको यजु:’ अर्थात ये यजु गद्यपरक हैं तथा ‘अनियताक्षरावसानो यजु:’ का अर्थ है जिनमें अक्षरों की संख्या निर्धारित नहीं है, वे यजु हैं।

यजुर्वेद में विशेषतया यज्ञ क्रियाओं और उसके भेद-प्रभेदों का विवरण तथा प्रतिपादन है। इसके दो भेद माने गए हैं- कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद या तैत्तिरीय और वाजसनेयी संहिता। यजुर्वेद के दो ब्राह्मण हैं- शुक्ल का शतपथ तथा कृष्ण का तैत्तिरीय। शास्त्रों का निश्चय है कि यजुर्वेद में जो भी प्रतिपादित है, उसी से यज्ञ का यजन किया गया। यज्ञों के यजन के कारण ही उसे यजुर्वेद नाम दिया गया।

यज्ञ के हृदय विष्णु हैं। यज्ञ उनके अधीन हैं इसलिए वे यजुष्पति, यज्ञपति कहलाते हैं। उन्होंने यज्ञ धारण किया हुआ है जिससे वे यज्ञधर और यज्ञपुरुष हैं। यज्ञ का फल देना भी श्रीविष्णु का ही कार्य है इसलिए वे यज्ञफलद कहलाए। वे ही यज्ञ के ईश्वर हैं इसलिए वे ही यज्ञेश, यज्ञेश्वर और यज्ञाधिपति हैं। वे यज्ञात्मा हैं, यज्ञभावन हैं, यज्ञक्रतु हैं, यज्ञमूर्ति हैं, यज्ञयोग हैं, यज्ञलिंग हैं, यज्ञवीर्य हैं, यज्ञवयव हैं, यज्ञसार हैं, यज्ञगुह्य हैं, यज्ञसेन हैं तथा यज्ञ की रक्षा करने वाले यज्ञत्राता भी हैं। शतपथ ब्राह्मण में यज्ञ को कृष्ण की संज्ञा दी गई है- यज्ञो हि कृष्ण:। श्रीकृष्ण का एक नाम यज्ञनेमि है। अग्नि यज्ञबाहु है। वैशम्पायन के शिष्य याज्ञवल्क्य एक प्रसिद्ध ब्रह्मवादी ऋषि थे जिन्होंने याज्ञवल्क्य स्मृति की रचना की थी। सती द्रौपदी और उनके भ्राता धृष्टद्युम्न का जन्म यज्ञ से हुआ था।

वहीं मनुस्मृति का कथन है कि वेदाध्ययन-ज्ञानविस्तार ब्रह्मयज्ञ है, तर्पण पितृयज्ञ है, होमादि कर्म देवयज्ञ है, बलिवैश्वादि कर्म भूतयज्ञ है तथा अतिथि आदि को तृप्त करना मनुष्य यज्ञ है।

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