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जीवन मंत्र:अगर हमारे पास कुछ अच्छा है तो आगे बढ़ें और उसे सभी तक पहुंचाएं :श्री महंत रविंद्र पुरी

कृष्णा नाम के एक संत थे। लोग उनको तपस्या की वजह से स्वामी मुक्तानंद कहने लगे थे। मुक्तानंद जी को ये बात हमेशा याद रहती थी कि स्वामी नित्यानंद जी ने उनके ऊपर एक कृपा की थी।

मुक्तानंद जी के बचपन में स्वामी नित्यानंद जी ने एक बार उनके माथे पर हाथ फेरा था और गाल सहला दिए थे। इस वजह से ही मुक्तानंद जी पर शक्तिपात हो गया था। यही ऊर्जा मुक्तानंद जी में बनी हुई थी।

मुक्तानंद जी पूरा देश घूमा करते थे और स्वामी नित्यानंद जी के गांव गणेश पुरी में अपना आश्रम बना लिया था। उनकी बहुत ख्याति हो चुकी थी। एक दिन आश्रम में कुछ शिष्यों ने अपने गुरु मुक्तानंद जी से पूछा, ‘योग का जो संदेश आप संसार को दे रहे हैं, वह इस आश्रम से देश में प्रसारित हो रहा है, लेकिन क्या इतना काफी है?’

मुक्तानंद ने कहा, ‘मैं यही सोच रहा हूं, मुझे अब विदेश यात्राएं करनी चाहिए।’

उस समय साधु-संतों की विदेश यात्राएं बहुत सीमित होती थीं। शिष्यों ने पूछा, ‘अगर आप विदेश यात्रा पर योग का संदेश देंगे तो आपको लगता है कि क्या वे ये संदेश स्वीकार करेंगे?’

मुक्तानंद जी ने कहा, ‘जब मैं विदेश से लौटकर आऊंगा, तब इस बात का उत्तर दूंगा।’

मुक्तानंद जी विदेश गए और तीन-चार महीनों के बाद लौटे तो उन्होंने शिष्यों से कहा, ‘एक बात मुझे भी समझ आ गई और आप भी समझ लें कि ध्यान और योग का संबंध किसी धर्म विशेष से नहीं है। कोई देश अगर ये दावा करे कि ये मेरा है तो ये भी सही नहीं है। ये मनुष्य के लिए है।’

इसी विचार की वजह से मुक्तानंद जी ने ऑस्ट्रेलिया, यूरोप घूमते रहे और सिद्ध योग धाम ऑफ अमेरिका जैसा संस्थान बनाया। जब वे यात्राएं करके अपने आश्रम आए तो उन्होंने शिष्यों से कहा, ‘देश के हर एक नागरिक तक ये संदेश पहुंचाना चाहिए कि अगर हमारे पास कुछ अनूठा ऐसा है, जिससे समाज की भलाई हो सकती है तो उसे सभी के साथ बांटना चाहिए। जो लोग प्रसन्नता, स्वास्थ्य और मानवता की सेवा करनी है, वे एक जगह तक सीमित न रहें, वे फैलें और दुनियाभर में ऐसा संदेश पहुंचाएं।’

सीख – अगर हम समाज कल्याण करना चाहते हैं तो हमें अपना क्षेत्र बढ़ाना चाहिए। कुछ अच्छी बातें और चीजें हमारे पास हैं तो उन्हें दूसरे लोगों के बांटना चाहिए, ताकि सभी भलाई हो सके।

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