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नारदजी ने भगवान को प्राप्त करने का क्या उपाय सुझाया था :स्वामी राम भजन वन

नारदजी से इस प्रकार उपदेश पाकर ध्रुव यमुना के तट पर स्थित मधुवन में आए और प्रभु की तपस्या करने लगे। इधर नारद जी महाराज उत्तानपाद के महल में पहुँचे। उत्तानपाद का मुखमंडल उदास था चेहरे पर चिंता की रेखा साफ झलक रही थी।

तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयंनुम:॥

 

प्रभासाक्षी के श्रद्धेय पाठकों ! आज-कल हम सब भागवत कथा सरोवर में गोता लगा रहे हैं।

 

पिछले अंक में हमने पढ़ा था कि – सुरुचि ने अपनी सौत के पुत्र बालक ध्रुव को राजा की गोद में नहीं बैठने दिया और हिदायत देते हुए कहा- यदि तुम राजा की गोद मे बैठना चाहते हो, तो परम पुरुष नारायण की आराधना कर उनकी कृपा से मेरे गर्भ में जन्म लो।

आइए ! अब आगे की कथा प्रसंग में चलते हैं—

 

देखिए ! ममता के कारण मति मलीन हो जाती है। रामावतार में कैकेई की मति भी मलीन हो गई थी और महाभारत में भी ममता के कारण ही अधर्म को अमर करने की कोशिश गांधारी ने की थी। पुत्र दुर्योधन को नग्न देखकर अजर-अमर करना चाहती थी। परिणाम क्या हुआ आप सभी जानते हैं।

 

मैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी ! डंडे की चोट खाकर जैसे साँप फुफकार मारने लगता है, उसी प्रकार अपनी सौतेली माँ के कठोर वचनों से घायल होकर पाँच वर्ष का छोटा बालक ध्रुव क्रोध के मारे लंबी-लंबी साँसे भरने लगा। रोते हुए अपनी माँ सुनीति के पास आया और सारा वृंतात कह सुनाया। माँ का कोमल हृदय भी शोक से संतप्त हो उठा। धैर्य का सहारा लेकर सुनीति ने बेटे ध्रुव को समझाया- बेटा ! तुम्हारी सौतेली माँ सुरुचि ने जो कहा वो ठीक ही कहा। महाराज उत्तानपाद को मुझे पत्नी तो दूर दासी कहने में भी शर्म आती है। तू मुझ अभागिनि के गर्भ से जन्म लिया है, मेरे दूध से पला-बढ़ा है। यदि तुम राजकुमार उत्तम के समान सिंहासन पर बैठना चाहते हो, तो द्वेष-भाव छोड़कर परम पिता परमेश्वर के चरण कमलों की आराधना में लग जाओ। माँ सुनीति ने अपने पुत्र ध्रुव कितनी सुंदर सलाह दी। देखिए ! हमारे जीवन में अच्छे सलाहकार का होना बड़ा जरूरी है। शकुनि ने दुर्योधन को सलाह दी थी और कृष्ण ने अर्जुन को परिणाम आप जानते हैं। माँ सुनीति ने ध्रुव को परम पिता परमेश्वर के चरण कमलों में ध्यान लगाने की सलाह दी। ध्रुव ने बिना समय गँवाए माँ को प्रणाम किया और तुरंत ईश्वर की खोज में निकल गए। रास्ते में नारद जी मिल गए। देखिए जो नर को नारायण से मिला दे, वही नारद है। नारद बोले, बेटा ! अभी तू बच्चा है खेलने कूदने की तुम्हारी उम्र है। इसलिए भगवान को प्राप्त करने की जिद छोडकर घर लौट जा। इस तरह से नारद ने बालक ध्रुव को बहुत सारे उपदेश दिए किन्तु ध्रुव विचलित नहीं हुए, उन्होंने हाथ जोड़कर नारद जी से कहा-

 

सोSयं शमो भगवता सुख दुख हतात्मनां। 

दर्शित कृपया पुंसो दुर्दशोस्मि द्विधेस्तु य: ।। 

 

भगवान ! आपका उपदेश मेरे लिए शिरोधार्य है। किन्तु सौतेली माँ सुरुचि के कठोर वचन रूपी बाणों ने मेरे हृदय को इस तरह विदीर्ण कर दिया है कि उसमें आपका यह उपदेश ठहर ही नहीं पाता। हे नारद जी ! यदि आप मुझ पर सचमुच प्रसन्न हैं, तो मुझे भगवत प्राप्ति का कोई अच्छा-सा मार्ग बताइए। आप संसार के कल्याण के लिए ही वीणा बजाते हुए सूर्य की भाँति त्रिलोकी मे विचरण करते हैं। ध्रुव को अच्छी तरह जाँच-परख करने के बाद नारद ने समझ लिया कि यह सही पात्र है। और कहा—

धर्मार्थ काममोक्षाख्यं य इच्छेत् श्रेय आत्मन:

एकमेव हरेस्तत्र कारणं पादसेवनम्।।

 

जिसको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अभिलाषा हो उसको एकमात्र हरि चरणों की सेवा करनी चाहिए। बेटा ! तेरा कल्याण होगा। यमुना नदी के किनारे मधुवन में जाओ वहाँ हरि का नित्य निवास होता रहता है। यमुना के निर्मल जल में स्नान कर पवित्रता से ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इस द्वादसाक्षर मंत्र से प्रभु का चिंतन करो। नारदजी से इस प्रकार उपदेश पाकर ध्रुव यमुना के तट पर स्थित मधुवन में आए और प्रभु की तपस्या करने लगे। इधर नारद जी महाराज उत्तानपाद के महल में पहुँचे। उत्तानपाद का मुखमंडल उदास था चेहरे पर चिंता की रेखा साफ झलक रही थी। नारद को देखते ही वे विह्वल हो उठे और कहने लगे–

 

सुतो मे बालको ब्रह्मन स्त्रैणेनाकरुणात्मना । 

निर्वासित सह मात्रा महान कवि पंच वर्षभि: ॥

 

हे मुनिवर! मैंने अपने पाँच साल के नन्हे से बच्चे को घर से बाहर निकाल दिया है। उसका कमल-सा मुख भूख से मुरझा गया होगा। थक गया होगा, कहीं उसे जंगली भेड़िये न खा जाएँ। वह बालक प्रेम वश मेरी गोद में बैठना चाहता था किन्तु दुष्ट सुरुचि के कठोर वचन सुनकर घर से चला गया। हे नारद जी ! मैं कितना अभागा और स्त्री का गुलाम हूँ। देखिए ! नारदजी जैसा दयालु संत इस त्रिभुवन में दुर्लभ है। नारदजी ने कहा-

 

मा मा शुच:स्व तनयमदेवगुप्तम विशाम पते।  

तत् प्रभावमविज्ञाय प्रावृङक्ते यद्यशो जगत्।।

 

हे राजन! तुम अपने बेटे की चिंता मत करो उसके रक्षक भगवान हैं।

नारद जी ने उत्तान पाद को विश्वास दिलाते हुए कहा—

 

किसका साहस है, हे राजन! जो उसे दुख पहुँचाएगा।

सूरज जिस जगह प्रकाशित है, कब वहाँ अँधेरा आएगा।।

हमें चिंता नहीं उनकी, उन्हें चिंता हमारी है 

हमारे नाव के रक्षक सुदर्शनचक्र धारी हैं। 

 

नारदजी ने कहा– आपका पुत्र शीघ्र ही परमपद प्राप्त करके आपके पास लौटेगा। उसके कारण आप सम्पूर्ण जगत में परम यशस्वी हो जाएंगे।

 

क्रमश: अगले अंक में…

 

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव…

 

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।

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