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काव्य रूप में पढ़ें श्रीरामचरितमानस: स्वामी राम भजन वन

श्रीराम चरित मानस में उल्लेखित अरण्य कांड से संबंधित कथाओं का बड़ा ही सुंदर वर्णन लेखक ने अपने छंदों के माध्यम से किया है। इस श्रृंखला में आपको हर सप्ताह भक्ति रस से सराबोर छंद पढ़ने को मिलेंगे। उम्मीद है यह काव्यात्मक अंदाज पाठकों को पसंद आएगा।

सफल जटायु के हुए, जन्म-जन्म के धर्म।

जन्म-जन्म के धर्म, रूप हरि का वह पाया

गीध देह को छोड़ मोक्ष का पथ अपनाया।

कह ‘प्रशांत’ फिर हुए अग्रसर दोनों भाई

गुफा-झाडि़यां देख-देख आंखें पथराई।।51।।

एक राक्षस मिल गया, जिसका नाम कबंध

प्रभु ने उसको मार कर, कर डाला निर्बंध।

कर डाला निर्बंध, सद्गति उसने पाई

फिर शबरी के आश्रम में पहुंचे रघुराई।

कह ‘प्रशांत’ अति प्रेममग्न थी शबरी माता

कैसे स्वागत करूं, समझ उसकी ना आता।।52।।

शबरी ने सादर किया, पूजन और प्रणाम

पा उसके आतिथ्य को, हर्षित थे श्रीराम।

हर्षित थे श्रीराम, कंद मूल-फल लायी

बड़े प्रेम से खाते रहे उन्हें रघुराई।

कह ‘प्रशांत’ करबद्ध खड़ी हो शबरी माता

बोली मैं हूं अधम, नहीं कुछ मुझको आता।।53।।

बतलाया श्रीराम ने, क्या है नवधा भक्ति

इनको जो अपनाएगा, पाएगा नव शक्ति।

पाएगा नव शक्ति, प्रथम संतन सत्संगा

दूजा सुने प्रेम से मेरे कथा प्रसंगा।

कह ‘प्रशांत’ तीजी सेवा गुरु चरण सुहाई

मेरे गुण गाए, ये चैथी बात बताई।।54।।

रामनाम के मंत्र में, हो पूरा विश्वास

यही पांचवी भक्ति है, करें नित्य अभ्यास।

करें नित्य अभ्यास, छठी सुन शबरी माता

इन्द्रिय-निग्रह शील-विराग संत से नाता।

कह ‘प्रशांत’ दुनिया को राममयी जो जाने

भक्ति सातवीं के मर्मों को वह पहचाने।।55।।

भक्ति आठवीं जानिए, हो दिल में संतोष

सपने में देखे नहीं, जो दूजों के दोष।

जो दूजों के दोष, छल-कपट को ना जाने

हर्ष-दैन्य से दूर, भरोसा मुझमें माने।

कह ‘प्रशांत’ ये नवम भक्ति है शबरी माता

एक सिद्ध जो कर ले, वह मुझको है भाता।।56।।

पूछी उससे राम ने, सीताजी की बात

कौन उसे है ले गया, क्या है तुमको ज्ञात।

क्या है तुमको ज्ञात, सरोवर पम्पा जाओ

रहता है सुग्रीव, मित्र तुम उसे बनाओ।

कह ‘प्रशांत’ वह ही सारा कुछ बतलाएगा

सीताजी का पता उसी से लग पाएगा।।57।।

इतना कह शबरी हुई, प्रभु के चरणाधीन

योगाग्नि प्रगटी वहां, हुई उसी में लीन।

हुई उसी में लीन, चले फिर दोनों भाई

सारा जग था सुखी, दुखी केवल रघुराई।

कह ‘प्रशांत’ था पम्पा सर अत्यन्त मनोहर

ऋषि-मुनियों के आश्रम, वृक्ष फूल-फल सुंदर।।58।।

बैठे थे श्रीरामजी, लखनलाल के साथ

नारदजी आये वहां, लेकर वीणा हाथ।

लेकर वीणा हाथ, उन्हें थीं कुछ शंकाएं

रघुनंदन ने उनको कुछ रहस्य बतलाए।

कह ‘प्रशांत’ मैं जिसको प्रेम बहुत करता हूं

उसको कोई अहित नहीं होने देता हूं।।59।।

जैसे नन्हे बाल का, रखती माता ध्यान

ऐसे ही निज भक्त का, मैं भी रखता मान।

मैं भी रखता मान, मगर जो होता ज्ञानी

अपने बल पौरुष के बारे में अभिमानी।

कह ‘प्रशांत’ ये है फिर उसकी जिम्मेदारी

करे शत्रु का नाश और अपनी रखवारी।।60।।

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