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जीवन मंत्र:दूसरी विचारधारा के लोग भले ही संकुचित मन वाले हों, हमें बड़ा मन रखना चाहिए:श्री महंत रविंद्र पुरी

आर्य समाज के तपोनिष्ठ स्वामी श्रद्धानंद जी एक पत्र बहुत ध्यान से पढ़ रहे थे। उन्होंने तीन बार उस पत्र को पढ़ा। पास में बैठे शिष्यों ने उनसे पूछा, ‘आप कुछ चिंतित दिख रहे हैं, ऐसा क्या लिखा है इस पत्र में और इसे भेजा किसने है?’

श्रद्धानंद जी ने कहा, ‘ये पत्र एक अंग्रेज पादरी ने भेजा है और रुड़की से आया है। उसने मांग की है कि वह हमारे आश्रम में रुककर हिन्दी भाषा सीखना चाहता है। उसने ये भी लिखा है कि मैं सिर्फ भाषा सीखने आ रहा हूं, किसी भी तरह से मैं ईसाई धर्म का प्रचार नहीं करूंगा।’

ये बातें सुनकर सभी शिष्य श्रद्धानंद जी की ओर देखने लगे। उन्होंने कहा, ‘हम स्वामी दयानंद के शिष्य हैं, हमारे स्वामी जी ने हमें सिखाया है कि जब भी कोई काम करो तो उस पर एक दृष्टि मत रखना, अनेक दृष्टिकोण से उस कर्म पर विचार करना और उसके बाद कर्म करना। अब प्रश्न ये है कि इन्हें अनुमति दी जाए या न दी जाए।’

सभी ने कहा, ‘हमें इस पादरी को अनुमति नहीं देनी चाहिए।’

श्रद्धानंद जी ने कहा, ‘हम उन्हें पत्र लिखते हैं और उसमें स्पष्ट कर देंगे कि आप हमारे यहां अतिथि बनकर आएं। हिन्दी भाषा सीखें, लेकिन आपको ये आश्वस्त करना होगा कि आप हमारे गुरुकुल में किसी भी ढंग से ईसाई धर्म का ऐसा प्रचार नहीं करेंगे कि विवाद हो जाए, लेकिन हम अनुरोध करेंगे कि आप ईसाई धर्म भी हमें समझाएं, ताकि हमारे यहां के विद्यार्थियों को ये मालूम हो सके कि अन्य धर्म की क्या खूबियां हैं। ईसा मसीह के जीवन को हम जानना चाहते हैं। हर धर्म के पास अपनी विशेषताएं होती हैं। वो तो कुछ लोग धर्म का गलत उपयोग करते हैं, इसलिए विवाद की स्थितियां बन जाती हैं।’

स्वामी जी का पत्र मिलने के बाद पादरी उस गुरुकुल में आए, उन्होंने हिन्दी सीखी। वहां वे इतने प्रभावित हो गए कि जीवनभर स्वामी दयानंद के सिद्धांतों का सम्मान करते रहे।’

सीख – जब दूसरे धर्म के लोग या दूसरी विचारधारा के लोग हमारे जीवन आते हैं तो वे भले ही संकुचित मन वाले हों, लेकिन हमें बड़ा मन रखना चाहिए। दृष्टिकोण स्पष्ट रखना चाहिए। हर एक व्यक्ति को ये अवसर जरूर दें कि वे हमसे जुड़ें, ताकि हम उसकी अच्छाइयों का उपयोग कर सकें। कोई भी इंसान पूरा बुरा नहीं होता है। बुरे इंसान में से भी अच्छाई निकाल ली जाए और अच्छे इंसान की बुराई को छोड़ देना चाहिए।

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