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लक्ष्य को हासिल करने से पहले किसी और कार्य में रुचि नहीं लेते श्रीहनुमानजी :स्वामी राम भजन वन

श्रीहनुमान जी की यह सुंदर यात्रा, अपने भीतर कितने सुंदर रत्नों को समेटे बैठी है, इसका कोई थाह ही नहीं है। अभी तो यात्रा का शुभारम्भ ही हुआ है। और श्रीहनुमान जी की यह लीला, हमें महान रहस्यों से मानो भिगो रही है। जिस समय समुद्र द्वारा भेजे गए पर्वत राज, उन्हें आराम करने का आग्रह करते हैं, तो श्रीहनुमान जी क्या करते हैं-

 

‘हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।’

 

श्रीहनुमान जी पर्वत राज को यह थोड़ी न कहते हैं, कि हे पर्वत राज! तुम्हारा साहस कैसे हुआ मेरा रास्ता रोकने का। मैं श्रीराम जी का इतना महान कार्य करने निकला हूँ। और निकलते ही तुमने मुझे रोक दिया। श्रीहनुमान जी ऐसा भी नहीं कहते कि पर्वत राज का निमंत्रण अस्वीकार ही कर देते हैं। श्रीहनुमान जी क्या करते हैं, कि पर्वतराज पर बैठ कर आराम तो नहीं करते, अपितु एक बहुत सुंदर प्रेरणा से ओतप्रोत व दिव्य संदेश से सराबोर एक लीला करते हैं। जी हाँ! श्रीहनुमान जी केवल अपने श्री करकमलों से पर्वत राज को बस छू भर-सा देते हैं। और प्रणाम कर कहते हैं, कि हे पर्वत राज! मैं ऐसे शुभ अवसर का लाभ अवश्य लेता। लेकिन आपको तो पता ही है, कि मैं प्रभु के विशेष कार्य हेतु निकला हूँ। और जब तक मैं प्रभु के इस पावन कार्य को संपूर्ण नहीं कर लेता, तब तक विश्राम की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता। सज्जनों श्रीहनुमान जी के यह शब्द बड़े मार्मिक हैं। वे अपने जीवन चरित्र से एक भक्त के स्वभाव, भाव व क्रिया कलाप का चित्रण प्रस्तुत कर रहे हैं।संसार में हमने बहुत से धर्म उपदेशकों को यह कहते हुए देखा होगा, कि भक्ति मार्ग पर आराम तो हराम है। भक्ति मार्ग क्योंकि सेवा का मार्ग है। तो सेवा में भला आराम का क्या औचित्य। जबकि श्रीहनुमान जी का सोचना ऐसा नहीं है। भक्ति मार्ग पर अगर आराम हराम ही होता, तो निश्चित ही श्रीहनुमान जी पर्वत राज को यहां कोई ठोस व कड़वा उपदेश देते ही। लेकिन श्रीहनुमान जी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। उल्टे वे तो पर्वत राज को प्रणाम करते हैं। और ससम्मान उनके आग्रह को अस्वीकार करते हैं। इसका अर्थ हुआ कि आराम कोई बुरी वृत्ति नहीं है। लेकिन हाँ, अगर जीवन में आराम को ही ‘राम’ अर्थात अपना लक्ष्य मान बैठ जाए, और अपनी इसी वृत्ति पर अडिग रहे, तो निश्चित ही आराम उसके लिए हराम है। आराम तो हमारा मन सदा ही चाहता है। संसार में किसका मन ऐसा है, जो नहीं चाहता, कि बैठे बिठाये सब कुछ मिलता जाए, तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है। लेकिन अगर आप अपने जीवन के परम लक्ष्य को ही भूले बैठे हैं, तो फिर जीवन का क्या अर्थ रह जायेगा। फिर तो पशुओं में और मनुष्य में कोई अंतर ही नहीं रह जायेगा। श्रीहनुमान जी की यही तो विशेषता है, कि वे अपने लक्ष्य को भेदे बिना कभी भी किसी स्वार्थ कार्यों में रुचि नहीं लेते। ऐसा नहीं कि भक्ति मार्ग इतना उदासीन होता है, कि भक्त कोई रस लेता ही नहीं है।श्रीहनुमान जी के ही संदर्भ में देखें, तो ऐसा नहीं कि श्रीहनुमान जी बस नीरस ही हैं। क्योंकि हनुमंत लाल जी जब माता सीता से भेंट कर लेते हैं, तो तब वे माता से निवेदन करते हैं, कि हे माता मुझे बहुत भूख लगी है। क्या मैं इस अशोक वाटिका के मधुर फलों का सेवन कर सकता हूँ? इसका सीधा-सा तात्पर्य है, कि भक्त भी संसार में आनंद लेता है, रस लेता है, लेकिन अपना लक्ष्य भेदने के पश्चात। वरना श्रीहनुमान जी के स्थान पर अगर कोई अन्य साधारण मानव होता, और उसके समक्ष ऐसा स्वर्ण का पर्वत स्वागत में आन खड़ा होता, तो क्या उसके पाँव चँद कदम भी आगे बढ़ पाते? या फिर स्वर्ण का पर्वत तो छोड़िए, स्वर्ण का नन्हां-सा कण भी मिल जाता तो, तो हम तो तभी निश्चित ही, वहीं अटक जाते। कारण कि हमारा कोई अपना लक्ष्य ही निर्धारित नहीं है। ‘जहाँ देखी तवा परात, वहीं हमने गुजारी रात’ निश्चित ही ऐसे लोगों का लक्ष्य राम नहीं अपितु आराम ही होता है। साथ में श्रीहनुमान जी का व्यवहार भी कितना सौम्य व मधुर है। वे पर्वत राज पर तनिक भी क्रोधित नहीं होते, और न ही उन्हें कोई कटु वचन कहते हैं। उल्टे वे पर्वत राज को प्रणाम कर देते हैं। कहने का अर्थ, अगर किसी समय साधक के समक्ष कोई ऐसा प्रसंग भी प्रस्तुत हो, जिसकी कि उस समय आपके लिए कोई प्रासंगिकता न हो, तो उसे अस्वीकार करने का तरीका कभी भी अपमान जनक अथवा दंभ से भरा नहीं हो। और न ही उस समय आप ऐसा महात्माओं जैसा व्यवहार करें, कि आप आवश्यक्ता से अधिक हलके प्रतीत होने लगें। और श्रीहनुमान जी ने यही किया। पर्वत राज को प्रणाम किया और आगे अपनी यात्र पर बढ़ जाते हैं।

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